- Riteish Deshmukh takes a leap into Telugu cinema with Ram Pothineni’s RAPO23
- From Ananya Panday to Kashika Kapoor to Janhvi Kapoor - 5 OG Bollywood Beauties Who Will Give You the Perfect Garba Looks You Need This Navratri
- From Reena Malhotra to Kamalpreet Dhanoa: 25 Years of Dia Mirza and Her Evolution as an Actor
- Who is Pragati Srivastava? The Fresh Face Set for a Promising Bollywood Debut with Aanand L Rai’s Nakhrewaalii
- Mia by Tanishq Launches "Lightscapes": A Jewellery Collection Inspired by the Magic of Festive Lights
गर्भावस्था के बेहतर परिणामों के लिए उन्नत एआरटी टैक्नोलाॅजी
इंदौर. छह वर्ष के अपने वैवाहिक जीवन में निशांत (38) और श्रेया (32) (नाम बदल दिए गए हैं) लगभग पिछले तीन वर्षों से संतान प्राप्ति का प्रयास कर रहे थे। कई असफल प्रयासों के बाद, जोड़े में पुरुष संबंधी बांझपन का निदान किया गया और अंततः उन्होंने आईवीएफ (इन-विट्रो निषेचन) उपचार करवाने का फैसला किया।
इसके बाद भी श्रेया के गर्भधारण में उन्हें सफलता नहीं मिली. तीन आईवीएफ-आईसीएसआई चक्र विफल होने के बाद, निशांत और श्रेया ने अंततः बेहतर परिणाम के लिए एक उन्नत सहायक प्रजनन तकनीक एआरटी (असिस्टेट रिप्रोडेक्टिव टेक्नोलॉजी) एमएसीएस को आजमाने का फैसला किया। आज, यह युगल 5 महीने के शिशु के माता-पिता के रूप में प्रसन्न है।
आईवीएफ सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाला एआरटी तकनीक है। उपचार में कई अंडों का उत्पादन करने के लिए अंडाशय की उत्तेजना, अंडाशय से अंडों को हटाने (अंडा पुनप्र्राप्ति), स्वस्थ शुक्राणुओं का चयन, प्रयोगशाला में अंडों और शुक्राणुओं के सामान्य निषेचन, और परिणामी भू्रण गर्भाशय में बाद में प्लेसमेंट ( भू्रण स्थानांतरण या ईटी कहा जाता है) शामिल है।
नोवा आईवीआई फर्टिलिटी, इंदौर में फर्टिलिटी कंसल्टेंट डॉ. कल्याणी श्रीमाली ने कहा, ‘आईवीएफ आमतौर पर ऐसे युगल चुनते हैं जो गर्भधारण के लिए एक वर्ष तक प्रयास करते रहने के बाद भी असफल रहते हैं। रोगियों का उपचार अक्सर क्षतिग्रस्त फेलोपियन ट्यूब, पुरुष संबंधी बांझपन जो आमतौर पर शुक्राणुओं की संख्या या शुक्राणुओं की गतिशीलता से संबंधित होता है, ओव्यूलेशन विकारों वाली महिलाएं जिनकी फेलोपियन ट्यूबों को हटा दिया गया है, समयपूर्व डिम्बग्रंथि विफलता, गर्भाशय फाइब्रॉएड, अस्पष्ट बांझपन आदि से संबंधित।
दो रोगियों के लिए उपचार विधियां कभी समान नहीं होतीं, क्योंकि प्रत्येक रोगी को अलग प्रजनन समस्या का सामना करना पड़ता है। एक रोगी दवा या आईयूआई (इंट्रायूटरिन इनसेमिनेशन) जैसे सरल उपचार से गुजर सकता है, जबकि अन्य को आईवीएफ या आईसीएसआई (इंट्रासाइटोप्लाज्स्मिक स्पर्म इंजेक्शन) के कई चक्रों की आवश्यकता हो सकती है। इस प्रकार, बेहतर उपचार के लिए बांझपन के कारण को समझना बहुत महत्वपूर्ण है।’
आईवीएफ विफलता के कारण
आईवीएफ विफलता के कारण को निर्धारित करना या उम्र, अंडे या शुक्राणु की गुणवत्ता गुणवत्ता का निर्धारण, गर्भाशय के स्वास्थ्य आदि के संभावित कारणों को समझना, उपचार की योजना बनाने में मदद करता है ताकि समस्या को प्रभावी ढंग से सुलझाया जाकर सफलता की बेहतर संभावनाओं को हासिल किया जा सकें। उन कारणों पर एक नजर, जिनके चलते आईवीएफ चक्र विफल हो सकता है –
उर्वरक विफलता
अंडों की गुणवत्ता आईवीएफ चक्र की सफलता में एक प्रमुख भूमिका निभाती है। एक महिला के अंडे की गुणवत्ता उसकी उम्र के साथ कम होती है। 30 वर्ष के मध्य के बाद एक महिला के डिम्बग्रंथि रिजर्व में तेजी से गिरावट आती है। कम संख्या में व्यवहार्य अंडे या उन्नत एफएसएच स्तर वाली महिलाएं आईवीएफ दवाओं के समुचित रिजल्ट नहीं दे पाती, जिससे सफल आईवीएफ चक्र की संभावना कम हो जाती है।
इसी तरह, शुक्राणुओं की गुणवत्ता भी आईवीएफ के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है। शुक्राणु का स्वास्थ्य, गतिशीलता और मात्रा अंडे को उर्वरित करने में इसकी दक्षता निर्धारित करती है। शुक्राणुओं में डीएनए विखंडन के मामले भी हैं जो भ्रूण में आनुवंशिकी या गुणसूत्र असामान्यताओं की वजह बनते हुए निषेचन विफलता का कारण बनते हैं।
प्रत्यारोपण विफलता
इम्प्लांटेशन विफलता की वजह गर्भाशय के स्वास्थ्य और / या भू्रण की गुणवत्ता हो सकती है। अगर एंडोमेट्रियम (गर्भाशय का अस्तर) भ्रूण को संलग्न करने के लिए पर्याप्त मोटा नहीं है या यदि यह पहले कुछ दिनों में भू्रण के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान नहीं करता है, तो भ्रूण का गर्भाशय की दीवार पर इम्प्लांट विफल हो जाताहै। फाइब्रॉएड, एंडोमेट्रियल पॉलिप्स, जन्मजात विसंगतियां, इंट्रायूटरिनल ऐड्हिशन, और हाइड्रोसाइपिंग जैसी स्थितियां कमजोर एंडोमेट्रियम का कारण बन सकती हैं। भू्रण का स्वास्थ्य गैमेट की गुणवत्ता पर निर्भर करता है; यदि भ्रूण को डीएनए विखंडन वाले शुक्राणुओं का उपयोग करके या अधिक उम्र के मातृत्व के साथ तैयार किया गया है तो एक प्रत्यारोपण विफलता हो सकती है।
एक आईवीएफ चक्र के परिणाम में एक रोगी की जीवनशैली भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एक पौष्टिक आहार, शरीर के स्वस्थ वजन को बनाए रखना, शराब और धूम्रपान में कमी या इससे दूरी, एक सफल आईवीएफ चक्र में मदद करता है। अधिक वजन वाली या कम वजन वाली महिलाएं न केवल बांझपन का जोखिम बढ़ाती हैं बल्कि सामान्य वजन की महिलाओं की तुलना में उनके सफल आईवीएफ चक्र की संभावना भी कम होती है।
ऐसी उन्नत टैक्नोलाॅजी जो आईवीएफ की सफलता दर में सुधार करती हैं
डॉ कल्याणी श्रीमाली के अनुसार, ‘व्यक्तिगत दवा और हेल्थकेयर सेवाओं में बढ़ती प्रवृत्ति के साथ आईवीएफ ने वैयक्तिकृत भ्रूण स्थानांतरण (पीईटी) और वैयक्तिकृत डिम्बग्रंथि उत्तेजना जैसे व्यक्तिगत प्रोटोकॉल की बढ़ती आवश्यकता देखी है। उपचार को अनुकूलित करने के लिए व्यक्तिगत समाधान डिम्बग्रंथि उत्तेजना के साथ विकसित किया गया है। एक उपयुक्त उपचार खोजने में सहायता के लिए एआरटी को कई समाधानों के साथ विकसित किया गया है, प्रत्येक जोड़े के लिए यह अलग हो सकता है। ब्लास्टोसिस्ट कल्चर, मैगनेटिक एक्टिवेटेड सेल शॉर्टिंग (एमएसीएस) और प्रजनन आनुवंशिकी जैसे प्रीइप्लांटेशन जेनेटिक स्क्रीनिंग (पीजीएस), प्रीइप्लांटेशन जेनेटिक डायग्नोसिस (पीजीडी), और एंडोमेट्रियल रिसेप्टिविटी ऐरे (ईआरए) ने सफलता दर को कई प्रतिशत बढ़ाने में मदद की है।’
भ्रूण को पारंपरिक आईवीएफ उपचार चक्र में गर्भाशय के 2 या 3 दिनों के भीतर गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया जाता है। जब एक भ्रूण को प्रयोगशाला में 5 दिन तक बढऩे की अनुमति दी जाती है, तो इसे ब्लैस्टोसिस्ट कल्चर के रूप में जाना जाता है। इस विधि में ब्लास्टोसिस्ट चरण तक भ्रूण की निगरानी की जाती है और सबसे व्यवहार्य को चुन कर उठाया और मां के गर्भ में लगाया जाता है। परंपरागत आईवीएफ विधि के विपरीत, ब्लास्टोसिस्ट कल्चर और सिंगल ब्लास्टोसिस्ट भ्रूण हस्तांतरण रोगियों में बार-बार की गर्भावस्था और आईवीएफ विफलता के जोखिम को कम करता है।
एमएसीएस एक स्पर्म तैयारी तकनीक है जिसमें एपोप्टोटिक वाले स्वस्थ शुक्राणुओं के चुंबकीय पृथक्करण शामिल होते हैं, उन्हें हटा दिया जाता है, जिनमें कम उर्वरता क्षमता होती है। एपोप्टोसिस (प्रोग्राम किए गए सेल मौत) कोशिका चक्र की विनियमन प्रक्रिया है जो स्पर्मटोजेनेसिस (शुक्राणु कोशिकाओं के विकास की प्रक्रिया) के दौरान हो सकती है, जिससे शुक्राणु डीएनए विखंडन जैसे सेल क्षति हो सकती है। पुरुष बांझपन के इलाज के लिए इसे एक एक प्रभावी विधि माना जाता है।
आनुवांशिकता, जोड़ों में आवर्ती गर्भावस्था के नुकसान के 10 प्रतिशत तक के लिए जिम्मेदार है। गुणसूत्रों की गलत संख्या वाले भ्रूण गर्भावस्था के पहले तिमाही के दौरान प्रत्यारोपण में विफलता या गर्भपात की वजह बनते हैं। प्रजनन आनुवांशिकी भ्रूण की जांच करने में मदद करती है और प्रत्यारोपण के लिए स्वस्थ भ्रूण का चयन करती हैं।
पीजीएस एक आईवीएफ चक्र के दौरान भ्रूण में गुणसूत्र असामान्यताओं के लिए स्क्रीनिंग को संभव बनाती है। एनीप्लोइडिस (गुणसूत्रों की संख्या में बदलाव) का पता लगाने के लिए ऐसे सभी 22 प्रकार के गुणसूत्रों का विश्लेषण पीजीएस का उपयोग करके किया जाता है, जो गर्भपात और पुनरावर्ती प्रत्यारोपण विफलता का प्रमुख कारण हैं।
पीजीडी ऐसे जोड़ों की सहायता करती है जिनके परिवार में ऐसी किसी आनुवांशिक स्थिति का इतिहास है, जिसके चलते जोड़े के लिए संतान-प्राप्ति मुश्किल हो रही है। तकनीक विशिष्ट अनुवांशिक बीमारियों और गुणसूत्र विकारों के लिए भ्रूण की जांच करने में मदद करती है ताकि उन्हें स्थानांतरित न किया जा सके।
इम्प्लांटेशन विंडो के दौरान एंडोमेट्रियल रिसेप्टीविटी की स्थिति निर्धारित करने में ईआरए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह एक सटीक समय अवधि भी देता है, जिस दौरान सफल गर्भावस्था प्राप्त करने के लिए भ्रूण को महिला के गर्भाशय में स्थानांतरित किया जा सकता है ताकि सफलता की दर बढ़ सके।
आईवीएफ प्रौद्योगिकियों में नवीनतम विकास संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले जोड़ों के साथ-साथ प्रजनन विशेषज्ञों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में उभरा है। भारत में दर्ज बांझपन के मामलों की संख्या में लगातार वृद्धि को देखते हुए, इस तरह की उन्नत एआरटी तकनीक देश में कई बेबस जोड़ों के लिए एक वरदान सरीखी हैं।


